गुरुवार, 23 जुलाई 2009

आशियाना 5

"आशियाना"

कभी कितने लाचार,
हम ख़ुद को पाते।

सब समझते सोचते,
फिर भी खो जाते।

बहुत रंजोगम में खड़े हुए,
अब हेःगिरते, फिर संभल जाते।

यह तोः आशियाना हेः , ऊँचा नीचा,
कभी ना कही , पग डगमगाते।

सहज -सहज कर , चलते हेः चलना,
फूलो की बेला में काँटों को पाते।

डॉ किरण बाला

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